बूंदी (राजस्थान टीवी न्यूज)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के तत्वाधान में तिरुपति विहार स्थित स्थानीय ब्रह्माकुमारीज केंद्र में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा, गीता ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन के गीता प्रवचन में नगर परिषद सभापति सरोज अग्रवाल, समाजसेवी नीलू अग्रवाल, केंद्र प्रभारी ब्रह्माकुमारी रजनी दीदी,ब्रह्माकुमारी गीता दीदी ने गीता माता की पूजा कर दीप प्रज्वलन किया एवं नगर परिषद सभापति सरोज अग्रवाल ने कथा करता है गीता दीदी का सोल ओढ़ कर स्वागत अभिनंदन किया ।
गीता प्रवचन के दूसरे दिन योग शक्ति गीता दीदी ने कहा कि गीता माना भगवान और अर्जुन का संवाद। जब किसी मनुष्य के जीवन में विषम परिस्थितियां आती है तो वह मन ही मन भगवान से संवाद करता है। हमने अपने जीवन को इतना जटिल बना दिया है कि जीवन में उलझने दिखाई देती है। यदि हम अपने जीवन के उद्देश्य को निश्चित कर ले तो हम जीवन के द्वंद को समाप्त कर सकते हैं ।
योग शक्ति गीता दीदी ने सांख्य योग अर्थात आत्मज्ञान और स्थितप्रज्ञ अवस्था का वर्णन करते हुए कहा कि यह शरीर ही कर्म करने का क्षेत्र है । इस शरीर द्वारा किए गए कर्म संस्कार के रूप में सामने आते हैं । जीवन में आने वाले सुख और दुख हमारे ही अच्छे या बुरे कर्मों का परिणाम है । गीता में हिंसक युद्ध की बात नहीं की गई है । जीवन में हर घड़ी संघर्ष करना पड़ता है जब हम नकारात्मक भावना के साथ संघर्ष करते हैं । तब जीवन कठिन लगने लगता है।
आगे उन्होंने आत्मा की शास्वतता के बारे में बतलाते हुए कहा कि आत्मा अविनाशी है, वह कभी मरती नहीं है। प्रकृति के पांच तत्व भी उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकते , सांसारिक बंधनों में बंद कर आत्मा कमजोर होती है। अवगुणों के वस होने से उसकी प्रभा कम हो जाती है । जैसे हम नया वस्त्र धारण करने के लिए पुराना वस्त्र उतार देते हैं वैसे ही आत्मा भी नया शरीर धारण करने के लिए पुराने शरीर का त्याग करती है। इसीलिए देह त्याग करने पर दुखी होने की जरूरत नहीं है । जब हम बाल्यावस्था से युवावस्था में और यौवन अवस्था से बुढ़ापे में जाने पर दुखी नहीं होते तो आत्मा के देह त्याग करने पर भी दुखी नहीं होना चाहिए । आगे उन्होंने बतलाया कि जिसने अपने शरीर की इंद्रियों को वश किया हुआ है वह अपरिग्राही है। वह कर्म बंधन में नहीं बंधता । जो द्वंदो से परे है । सफलता - असफलता में समान रहता है। जो संगदोष की आसक्ति से रहित और अभिमान से मुक्त स्थिर बुद्धि है ,ऐसी संतुष्ट आत्मा के पूर्व के सारे विकर्म ज्ञान यज्ञ से दग्ध हो जाते हैं। ज्ञान यज्ञ से बुद्धि का शुद्धीकरण होता है । पाप आत्मायें भी ज्ञान नैया के द्वारा संसार सागर को पार कर जाती है।
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि जिसने इंद्रियों के संयम से वासनाआओं को जीता है । जिसकी साधना में आसक्ती नहीं है और जो परमात्मा में श्रद्धा तथा विश्वास रखता है ,वह ज्ञान मार्ग पर अग्रसर हो कर परम शांति को प्राप्त कर लेता है । इसके विपरीत विवेकहीन श्रद्धारहित संशय युक्त आत्मा पुरुषार्थ के मार्ग से भ्रष्ट हो जाती है और परम शांति से वंचित हो जाती है ।
योग शक्ति गीता दीदी ने श्रीमद भगवत गीता के रहस्यों को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज का मानव अपने जीवन को जी तो रहा है, लेकिन वह अपने सही स्वरूप और सत्य से बहुत दूर है। श्रीमत भगवत गीता हमें तीनों कालों का स्पष्ट परिचय देती है - हम कौन थे, क्या हैं और क्या बनने वाले हैं। उन्होंने कहा कि गीता हमें संतुलित जीवन जीने की कला सिखाती है, जिसके द्वारा हमें यह ज्ञान प्राप्त होता है कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए।
*सात्विक जीवन और खान-पान*
उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया हमें अपने खान-पान पर भी बहुत ध्यान देना होगा। हमें ऐसा भोजन करना चाहिए जो हमारे दैवीय गुणों को बढ़ाए, न कि आसुरी गुणों को। उन्होंने कहा कि आसुरी संस्कारों को लेकर चलने से कर्मबंधन बनते हैं और क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार के वश होकर किए गए कर्म हमें बंधनों में बांधते हैं।
*कर्मबंधन से मुक्ति*
योग शक्ति गीता दीदी ने बताया कि अगर हम स्वाध्याय, स्व चिंतन और तप करेंगे और परमात्मा के मार्गदर्शन पर चलेंगे, तो हम कर्मबंधनों से मुक्त हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि अपशब्दों को बोलकर और क्रोध के वश होकर किए गए कर्म भी हमें बंधनों में बांधते हैं। योग शक्ति गीता दीदी जी ने अर्जुन और दुर्योधन के उदाहरण के माध्यम से समझाया कि अर्जुन ने संसार को छोड़कर परमात्मा को चुना और अपनी समस्याओं का समाधान पाया, जो पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शन बन गया। दूसरी ओर, दुर्योधन ने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए गलत मार्ग और सलाहकारों को चुना, जिससे उसका राज्य और चरित्र दोनों नष्ट हो गए और वह अपने कुल के विनाश का कारण बना।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने भगवत प्रसाद ग्रहण किया
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