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Wednesday, April 16, 2025

जो व्यक्ति राग द्वेष से उत्पन्न द्वंद से ग्रसित हे वह परमात्मा को नहीं जान पाते- गीता दीदी

राजेश खोईवाल 
बूंदी (राजस्थान टीवी न्यूज)
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के तत्वाधान में तिरुपति बिहार स्थित स्थानीय ब्रह्माकुमारीज केंद्र में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा, गीता ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन के गीता प्रवचन में जिला भाजपा अध्यक्ष रामेश्वर मीणा , कृषि विज्ञान केंद्र प्रभारी प्रोफेसर हरीश जी, राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी गीता दीदी, ने गीता माता की पूजा कर दीप प्रज्वलन किया एवं सिवनी मध्य प्रदेश से पधारे गीता दीदी को माल्यार्पण कर स्वागत किया ।
गीता प्रवचन के तीसरे दिन योग शक्ति गीता दीदी ने कहा कि परमात्मा की शरण उनको प्राप्त होती है जो परम ज्ञानी और परमात्मा प्यार में समाए हुए होते हैं। क्योंकि ईश्वर उन्हें अत्यंत प्रिय है, इसलिए ऐसे मनुष्य ईश्वर को भी अत्यंत प्रिय है। परमात्मा कहते हैं वह उन्हें अपने समान लगते हैं, ऐसे महात्मा अत्यंत दुर्लभ होते हैं। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता की मीमांशा करते हुए कहा कि परम सत्य वही है जो सभी धर्मों को स्वीकार हो। भगवान ने गीता में अपना परिचय देते हुए अर्जुन को बताया कि प्रकृति, पुरुष और परम पुरुष इन तीन शक्तियों से सारे संसार का खेल चल रहा है। मैं परम पुरुष अर्थात सर्वश्रेष्ठ हूं, मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है, मैं मनुष्य सृष्टि का बीज रूप हूं, मैं प्रकृति के अधीन नहीं हूं। अर्जुन के यह पूछने पर कि सभी मनुष्य परमात्मा को क्यों नहीं जान पाते। भगवान ने बतलाया कि जो व्यक्ति राग द्वेष से परे उत्पन्न द्वंद से ग्रसित है वह मुझे नहीं जान पाते हैं। इसलिए बुद्धिहीन मूडमति पुरुष मुझ अव्यक्त परमात्मा को व्यक्त भाव में ढूंढते हैं। और अजन्मा अविनाशी सर्वोच्च शक्ति को नहीं जान पाते हैं। परमात्मा का वास्तविक स्वरूप श्रीमद भगवत गीता के अनुसार "ना तमाम शक्य से दृष्ट नेम एवं स्वच्छ रूपा" अर्थात गीता ज्ञान दाता कह रहे हैं "हे अर्जुन मुझे इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख पाओगे" क्योंकि मैं पंचतत्व से पर ही हूं अर्थात निराकार हूँ , आकाश में हजारों सूर्य के उदय होने से उत्पन्न प्रकार के समान ही मेरा स्वरूप है। रामचरितमानस के अनुसार "बल चले सुने बिनु काना कर बिनु कर्म करें विधि नाना" और ईसाई धर्म के अनुसार कहा गया है परमात्मा को "गॉड इज लाइट" तो मुस्लिम धर्म में परमात्मा को "अल्लाह नूर" है तो सिख धर्म के अनुसार "एक ओंकार निराकार है" सनातन धर्म कहता है "देवों के देव महादेव" जैसे हम आत्माएं प्रकाश स्वरूप हैं ऐसे ही आत्मा का पिता परमात्मा भी प्रकाश स्वरूप है। जिनको प्यार से हम शिव बाबा कहते हैं। योग शक्ति गीता दीदी ने आगे बताया कि परमात्मा अति धर्म ग्लानि के समय सत्य धर्म की स्थापना और अनेक धर्मों का विनाश करने के लिए अत्यंत साधारण शरीर में पकाया प्रवेश करके अवतरित होते हैं। यदि श्री कृष्ण के रूप में आए तो उसे तो उस मनमोहक रूप धारी को तो सभी पहचान जाएंगे, लेकिन परमात्मा ने बताया है कि जो पुण्य कर्म करते हैं जिनके पाप नष्ट हो गए हैं जो राग द्वेष आदि से मुक्त होकर मन से मेरा ध्यान करते हैं वही मुझे पहचान पाते हैं। भगवान ने अर्जुन से कहा कि काम क्रोध शत्रु है यह शत्रु परमात्म स्मृति में टिकने नहीं देंगे। परमात्मा को याद करते समय मायावी प्रकृति भयंकर बाधा के रूप में सामने आ जाती है। उन्होंने बताया कि मृत्यु के समय उसकी जैसी अवस्था होती है वैसी ही उसकी गति होती है। अध्यात्म क्या है इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने बतलाया कि आत्मा और परमात्मा के ज्ञान द्वारा जिसने माया यानी काम क्रोध आदि विकारों पर विजय प्राप्त कर सके भाव में स्थित हो उन्नति को प्राप्त कराएं वही अध्यात्म है। उन्होंने मन वचन और कर्म में एकरूपता लाने की आवश्यकता बतलाते हुए कहा कि जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो इन तीनों में समसंभावित जरूरी है। इसी प्रकार मेडिटेशन के बारे मे उन्होंने कहा की मेडिटेशन में हम शरीर से अलग अर्थात अशरीरी होने का अभ्यास करते हैं, जिससे अंत समय में हमें शरीर का त्याग करने में कोई कठिनाई नहीं होती है।
        दीदी जी ने आगे कहा कि आज चार प्रकार की प्रवृत्ति वाले मनुष्य दिखलाई पड़ते हैं पहला वे जो सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक जीवन जीने वाले मनुष्य हैं जो आदर्श दिव्य गुणों को धारण कर अभय स्वरूप में रहते हैं पर चिंतन एवं प्रदर्शन से मुक्त रहते हैं, दूसरे वे लोग सात्विक प्रवृत्ति वाले होते हैं जो देवी देवताओं की पूरी आराधना में लगे रहते हैं, तीसरे और चौथे प्रकार वाले राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति वाले होते हैं जो लाखों इच्छाओं के जाल में बंद कर विषय उपभोग की पूर्ति के लिए अन्याय पूर्वक धन का संग्रह करने वाले होते हैं। इसी भ्रम में जीने लगते हैं कि वह सर्व संपन्न उपयोगी हैं सिद्ध पुरुष है बलवान और सुखी हैं। यह ब्रह्म उसके अंदर होते रहते हैं कि हम जो चाहे कर सकते हैं इस कारण से भी अनेक प्रकार के जाल में जैसे बनते जाते हैं।
        आपने आगे जीवन जीने की संपूर्ण विधि के बारे में बतलाते हुए कहा कि मनुष्य में जीवन जीने के लिए कौन सी चीज आवश्यक है, मनुष्य जीवन किस प्रकार होनी चाहिए, अपने तीन प्रकार की प्रगति तीन प्रकार का त्याग तीन प्रकार के सुख तीन प्रकार धारणा शक्ति तीन प्रकार के कर्म विस्तार पूर्वक उपस्थित धर्मप्रेमियों के समक्ष व्यक्त किए।
     इस अवसर पर बड़ी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसाद ग्रहण किया। दीदी ने परमात्मा का ध्यान करवाया करवा कर परम शांति की अनुभूति करवाई

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