बूंदी (राजस्थान टीवी न्यूज)
बूंदी राजस्थान भारतीय पुलिस महासंघ के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष यूरोप के नार्वे निवासी कुलदीप सिंह राठौड़ ने दिवंगत पुनीत आत्मा पप्पा जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए बताया कि
पीएम नरेंद्र मोदी के गुरु
युग पुरुष स्वर्गीय श्री पप्पा जी की पुण्य जन्म जयंती पर उन्हें नमन करता हु
स्व .पप्पा जी का जन्म 6 जून 1912 को राजकोट गुजरात में हुआ था
पप्पा जी की अंतिम यात्रा में तत्कालीन गुजरात के सीएम व वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी चार्टेट प्लेन से जयपुर पहुंचे थे
नरेन्द्र मोदी को गुरु बनकर संघ में लाने का श्रेय भी पप्पा जी को ही जाता है
नरेंद्र मोदी ने 2001 में मुख्यमंत्री बनने के बाद लिखी गई अपनी एक किताब में अपनी प्रेरणाओं का खुलासा किया है। गुजराती में लिखी गई इस किताब का नाम ज्योतिपुंज है। इस अध्याय में, नरेंद्र मोदी उस दंत चिकित्सक को श्रद्धांजलि देते हैं, जिसने गुजरात में सबसे पहले आरएसएस का विस्तार किया और उसके सांस्कृतिक संदेश को आदिवासियों तक पहुँचाया।
डॉ. प्राणलाल व्रजलाल दोशी एक ऐसा नाम है जिसे बहुत से लोग पहचानते नहीं हैं। अगर कोई डॉ. पीवी दोशी का ज़िक्र करे, तो शायद कुछ लोग पहचान में सिर हिलाएँ। लेकिन अगर ‘पप्पाजी’ का नाम लिया जाए तो गुजरात के हर कोने में लोगों की आंखें चमक उठेंगी।
एक ध्येयनिष्ठ तपस्वी – पूज्य पप्पाजी (डॉ. प्राणलाल दोशी)
पूज्य पप्पाजी — संघ कार्य को समर्पित एक ऐसा नाम, जिनका जीवन स्वयंसेवकत्व की जीवंत परिभाषा था। राजकोट महानगर में संघ के कार्यों को उन्होंने जिस तरह अपने जीवन का मिशन बनाया, वह हर स्वयंसेवक के लिए एक आदर्श है।
बालासाहेब देवरस जी के स्वास्थ्य के प्रति उनकी चिंता, निसर्गोपचार की व्यवस्था, और उनके साथ बिताए गए आत्मीय क्षण — यह सब उनकी सेवा भावना को दर्शाते हैं। संगठन के कार्यों के लिए उन्होंने कभी व्यक्तिगत हितों की चिंता नहीं की। कार्यकर्ताओं की कठिनाइयों को उन्होंने अपनी जिम्मेदारी माना।
पप्पाजी का सम्पूर्ण जीवन एक तपस्या था — शाखा में नियमित उपस्थिति, कठिन परिस्थितियों में भी संयमित कार्य, और संघ के मूल्यों के प्रति अद्भुत आस्था। उनका स्नेहिल, मधुर और आत्मीय स्वभाव सभी को आकर्षित करता था।
उनकी स्मृति हम सबके लिए एक प्रकाशस्तंभ है — जो हमें दिखाता है कि त्याग, सेवा और सिद्धांतनिष्ठा से युक्त जीवन कैसा होता है।
दोशी के जीवन, संघकार्य में उनके योगदान और उनके प्रेरणादायी व्यक्तित्व को सम्मानपूर्वक स्मरण करता है। जैसा कि आपने संकेत दिया है, यदि इस सामग्री को एक साहित्यिक, संपादित संस्करण या स्मरणिका ग्रंथ की प्रस्तावना के रूप में तैयार किया जाए, तो वह न केवल स्मृति का दस्तावेज़ बनेगा, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी एक प्रेरक स्रोत होगा।
संघ जीवन में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही जन्म लेते हैं, जिनका जीवन स्वयं एक शिक्षाग्रंथ बन जाता है — जिन्हें केवल देखा नहीं जाता, अपितु जिया जाता है, समझा जाता है, और आत्मसात किया जाता है। स्व. डॉ. प्राणलाल व्रजलाल "पप्पाजी" दोशी ऐसे ही एक आदर्श स्वयंसेवक थे, जिनका जीवन तप, सेवा और समर्पण की त्रयी पर आधारित था।
यह स्मरणिका, उनके संघ-कार्य, व्यवहार, और प्रेरक जीवन के विविध पहलुओं को समेटने का एक विनम्र प्रयास है। इसमें उनके समकालीन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने जो संस्मरण साझा किए हैं, वे पप्पाजी के व्यक्तित्व की अनेक भाव-छवियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
एक आत्मीय मित्रता:
स्व. पप्पाजी और असम के प्रथम प्रांत संघचालक स्व. गिरधर शर्मा जी की मित्रता न केवल दो सेवाभावी हृदयों का मिलन थी, बल्कि यह राष्ट्रकार्य के प्रति एकजुट संकल्प की सजीव मिसाल भी रही। कठिन समय — विशेषतः आपातकाल के दौरान — भी इनका आपसी स्नेह और पत्राचार चलता रहा, जो पप्पाजी की आत्मीयता और निरंतर संपर्क भावना को दर्शाता है। निष्ठा और सेवा का पथ:
पप्पाजी का संघ के प्रति समर्पण केवल विचार तक सीमित नहीं था — वह उनके आचरण में प्रत्यक्ष झलकता था। जेल जाने का साहस हो या बालासाहेब जी की सेवा में समय देना — हर कार्य में उनका समर्पण पूर्ण रहा। वे आजीवन स्वयं को "शिक्षार्थी" मानते रहे — यह विनम्रता ही उन्हें महान बनाती है।
श्रद्धांजलियाँ — अनुभूतियों की अभिव्यक्ति:
स्मरणिका में सम्मिलित दीनानाथ बत्रा, डॉ. पी. एल. चतुर्वेदी, और डॉ. गिरीश जे. त्रिवेदी जैसे वरिष्ठजनों की श्रद्धांजलियाँ केवल औपचारिक नहीं, बल्कि उनके हृदय से निकली भावनाएँ हैं। ये हमें पप्पाजी के उस अदृश्य प्रभाव से परिचित कराती हैं, जो उन्होंने असंख्य हृदयों पर छोड़ा।
पप्पाजी का जीवन किसी एक संस्था या प्रदेश तक सीमित नहीं था — वह एक व्यापक सामाजिक चेतना का वाहक था। उन्होंने पारिवारिक सुखों की परवाह किए बिना जनसेवा को व्रत रूप में स्वीकार किया। उनके जीवन से हर स्वयंसेवक यह सीख सकता है कि सच्चा कार्यकर्ता वही है जो "स्वयं को पीछे रखकर समाज को आगे रखे"।
यह स्मरणिका केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य का पथप्रदर्शक बनने की सामर्थ्य रखती है।
पप्पाजी अमर हैं — अपने विचारों, कर्मों, और आदर्शों में।
उनके चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए, यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित है।
"सदा रहे वह दीप जलता, सत्य-पथ का जो सिखाता।
स्वयं झुके जो दूसरों को, ऊँचाइयों तक पहुँचाता।"
आपके द्वारा प्रस्तुत किया गया यह पाठ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेताओं के आपसी संबंधों, उनके स्वास्थ्य की चिंता, और उनके आपसी स्नेह व सेवा-भाव को बहुत ही आत्मीयता से चित्रित करता है। इसमें मुख्यतः पूज्य बालासाहेब देवरस के स्वास्थ्य, उनके राजकोट प्रवास और पू. पप्पाजी (संभवतः संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता) द्वारा उनके लिए की गई व्यवस्था का वर्णन किया गया है।
पू. श्री गुरुजी (डॉ. हेडगेवार के उत्तराधिकारी एम.एस. गोलवलकर) के देहावसान के बाद जब बालासाहेब देवरस सरसंघचालक बने, तो मधुमेह (डायबिटीज़) की बीमारी के कारण उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता स्वाभाविक थी। लोगों को यह संदेह था कि क्या वे नियमित प्रवास व कार्यक्रमों में भाग ले सकेंगे।
पप्पाजी की भूमिका:
पूज्य पप्पाजी बालासाहेब जी के स्वास्थ्य को लेकर अत्यंत चिंतित थे और उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रयासरत थे। उन्होंने पू. डॉक्टरजी की जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में हुए एक वर्ष के भ्रमण के बाद बालासाहेब जी को राजकोट आकर विश्राम और चिकित्सा के लिए आमंत्रित किया।
राजकोट प्रवास और चिकित्सा:
बालासाहेब जी ने पप्पाजी के स्नेहपूर्ण आग्रह को स्वीकार करते हुए राजकोट में एक सुप्रसिद्ध निसर्गोपचार विशेषज्ञ के पास हर्बल और ऑक्युप्रेशर चिकित्सा ली। यह उपचार प्रभावशाली रहा और इसका सकारात्मक असर सभी ने महसूस किया।
पप्पाजी व उनके सुपुत्र प्रफुल्ल , जो स्वयं एक चिकित्सक थे, पूज्य बालासाहेब की चिकित्सा पर सतत निगरानी रखे हुए थे। पप्पाजी स्वयं दिन में दो बार उनसे मिलने आते थे।
पप्पाजी और उनके परिवार के साथ इस अवधि में निकट संबंध बना। बालासाहेब ने डॉ. प्रफुल्ल के नए दंतचिकित्सा केंद्र में दांतों की चिकित्सा भी करवाई, जिससे उनके पारस्परिक स्नेह और आत्मीयता का परिचय मिलता है। बालासाहेब का राजकोट प्रवास वहां के स्वयंसेवकों के लिए बहुत बड़ी प्रेरणा का कारण बना
जो स्व. डॉ. प्राणलाल व्रजलाल "पप्पाजी" दोशी के संघ जीवन, उनके योगदान, और उनके आदर्श व्यक्तित्व की स्मृति में लिखा गया है। इसमें विभिन्न वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बिताए हुए समय, उनके कार्य, उनके व्यवहार, और प्रेरक जीवन के प्रसंगों को साझा किया है।
पप्पाजी और असम के प्रथम प्रांत संघचालक स्व. गिरधर शर्मा के बीच गहरा स्नेहपूर्ण संबंध था।
गिरधर जी की प्रांत संघचालक पद पर नियुक्ति 21 जून 1975 को हुई, पर कुछ ही दिनों बाद 26 जून को आपातकाल लागू हुआ। 1977 में आपातकाल समाप्ति के बाद जब गिरधर नागपुर आए, तभी उनका पप्पाजी से प्रथम परिचय हुआ।
पप्पाजी की सरलता और आत्मीयता से गिरधर जी अत्यंत प्रभावित हुए।
गिरधर जी ने पप्पाजी को असम आमंत्रित किया था,
ताकि वे वहाँ के कार्य को देखकर मार्गदर्शन दे सकें।
लेकिन 1978 में गिरधर जी के आकस्मिक निधन के कारण यह यात्रा संभव न हो सकी।
पप्पाजी असम की जानकारी लेते रहते थे और गिरधर जी के परिवार की भी चिंता करते थे।
पप्पा जी
संघ प्रतिबंध के दौरान जेल भी गए पर सिद्धांतों से नहीं हटे।
बालासाहेब जी के मुंबई में इलाज के समय भी कई बार मिलने पहुंचे।
जीवन पर्यंत "सदैव शिक्षार्थी" रहे।
स्व. पप्पाजी का जीवन संघ के स्वयंसेवकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रेरणास्त्रोत है। उनका संकल्प, समर्पण, और समाज सेवा के लिए उनका अथक परिश्रम हर कार्यकर्ता के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है।
पूज्य पप्पाजी प्रेरक, तपस्वी और ध्येयनिष्ठ जीवन का एक सुंदर, विस्तृत चित्रण है। उनके व्यक्तित्व, कार्यशैली, संघ कार्य के प्रति उनकी निष्ठा, और अनेक स्वयंसेवकों के साथ उनके आत्मीय संबंध थे
पप्पाजी के देहावसान के बाद उनके कार्यों और व्यक्तित्व की अमिट छाप है उनकी
निस्वार्थ सेवाभाव और संगठन निष्ठा:
पप्पाजी ने व्यक्तिगत स्वास्थ्य या आराम की चिंता किए बिना, संघ कार्य में निरंतरता बनाए रखी। बालासाहेब देवरस जी के राजकोट प्रवास की व्यवस्था और उनके उपचार की देखरेख इसका उदाहरण है।
मानवता और आत्मीयता का सागर:
बीमार कार्यकर्ताओं की देखभाल, अस्पताल में भर्ती कराना, दवाइयों की व्यवस्था — इन सभी घटनाओं से उनके संवेदनशील मन और सेवाभाव का परिचय मिलता है।
संगठनात्मक कुशलता और नेतृत्व:
वे न केवल स्थानिक स्तर पर, बल्कि प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर भी संघ के दायित्वों का निर्वहन करते रहे। उनका दृष्टिकोण व्यापक था, किंतु कार्यप्रणाली अत्यंत व्यावहारिक और आत्मीय।
प्रेरणास्रोत के रूप में जिस प्रकार श्रद्धांजलि अर्पित की गई है, वह स्पष्ट करता है कि पप्पाजी का जीवन केवल भूतकाल की स्मृति नहीं, बल्कि आज के कार्यकर्ताओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा है।
अंतर्राष्ट्रीय कोर्डिनेटर मेवा सिंह, मानव सेवा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश खोईवाल, शिवसेना जिला प्रमुख राजेंद्र सिंह नरूका समाजसेवी रवि कुमार गोंद ने नम आंखों से दिवंगत पप्पा जी को श्रद्धांजलि अर्पित की है
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